भारतीय स्टेट बैंक के अध्यक्ष प्रतीप चौधरी ने कृषि को एक बड़े दायरे में देखने की जरुरत बताया। चौधरी ने लोक पंचायत को दिये गये एक साक्षात्कार में किसानों और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए बैंक द्वारा दी जा रही सुविधाओं और योजनाओं पर विस्तार से चर्चा की –

 

भारतीय स्टेट बैंक किसानों और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए क्या कुछ कर रहा है?

बैकों के ऊपर जो जिम्मेदारी है हम उसे पूरा कर रहे हैं। अगर हम मान लें कि सौ रूपये ऋण दिया गया तो उसका 13.5 प्रतिशत प्रत्यक्ष कृषि को जाएगा और 4.5 प्रतिशत अप्रत्यक्ष कृषि को जाएगा। अप्रत्यक्ष कृषि में जैसे नेशनल कोऑपरेटिव डेवलपमेंट कोर्पोरेशन या नैफेड है, जो कि स्वयं किसान नहीं है पर कृषि और किसानों के हित से जुड़कर ये काम कर रहे हैं। हर बैंक की जिम्मेदारी है कि 13.5 प्रतिशत किसानों को प्रत्यक्ष दें और 4.5 प्रतिशत इन संस्थाओं को देकर 18 प्रतिशत पूरा करें। इस प्रकार बैंक द्वारा दिये जाने वाले ऋण को देखें तो पूरे देश में दिया गया ऋण अभी 30 लाख करोड़ है।

अप्रत्यक्ष के धन से प्रत्यक्ष के धन को पूरा नहीं कर सकते हैं। अगर प्रत्यक्ष में 14.5 या 15 कर देता है तो अप्रत्यक्ष में 3 प्रतिशत हो सकता है। कृषि क्षेत्र के लिए कुल 18 प्रतिशत देना जरुरी है, इसलिए हमारे किसानों के लिए मुख्य रूप से दो योजनाएं हैं। पहला एग्रीकल्चर कैश क्रेडिट, इसके माध्यम से किसानों को कृषि के लिए खाद, सिंचाई, बीज आदि के लिए पैसा मुहैया कराया जाता है। इसकी वसूली जब फसल कट जाए तब की जाती है। जैसे मान लें कि फसल 6 महीने की है और किसी किसान ने पचास हजार रूपया लिया तो 6 महीने के बाद एक महीने में कटाई वगैरह हो गई, तो उसके बाद वह पूरा पैसा वापस कर देगा। और अगर कहीं लम्बी अवधि की फसल है, जैसे गन्ना जो 6 महीने में नहीं होता है तो वहां यह 9-10 महीने में होगा। यह एक चक्र है जो लेगा और कटाई के बाद वह वापस कर देगा। दूसरा ऋण एग्रीकल्चर टर्म लोन है। क्योंकि खाद, बीज वगैरह के अलावा किसान को दूसरे उपकरण भी चाहिए। जैसे पम्पसेट, ट्रैक्टर या स्प्रिंकलर आदि है जो 6 महीने में वापस नहीं दे पाएगा। तो इन उपकरणों के लिए एग्रीकल्चर टर्म लोन होती है। टर्म लोन के अन्दर ट्रैक्टर का ऋण 5 से 7 साल में लौटाया जाता है। इसे मियादी ऋण कहते हैं। जिसे मियाद के ऊपर वापस किया जाता है।

 

किसानों के लिए ऋण पर छूट की क्या योजनायें हैं?

कैश क्रेडिट के लिए भारत सरकार की एक योजना है जिसके अंतर्गत बैंक केवल 7.5 प्रतिशत तक सालाना ब्याज लगाते हैं और सरकार 3 प्रतिशत की सब्सिडी देती है। पर ये सब्सिडी तभी किसानों को मिलेगी जब वह समय पर पैसा लौटा दें। अगर समय पर नहीं लौटाएगा तो उसे 10.5 प्रतिशत ब्याज का भुगतान करना होगा। कुछ राज्य सरकारों ने कहा है कि आप 7.5 भी लेंगे तो उस पर हम 2 प्रतिशत या 3 प्रतिशत देंगे। पर ये उसके ऊपर है इससे मूल्य और कम हो जाएगा। किसानों को इसका पूरा फायदा लेना चाहिए। अगर किसान समय पर ऋण चुका दें तो हमें दूसरी बार देने में आसानी हो जाती है। एक बार अगर किसान इसमें पीछे हो जाता है तो दुबारा उनको पैसा देने में कठिनाई होती है। पर ये पद्धति बहुत सरल है। अपनी जमीन का प्रमाण दिखाना है। क्या खेती करना है ये बताना है। हर फसल के अनुसार दर बने हुए हैं कि गेहूं पर कितना मिलेगा या सरसों व कपास पर कितना। मेरे समझ से कृषि को और बड़े रूप से देखना चाहिए क्योंकि किसान का काम सिर्फ फसल की कटाई और बुआई से नहीं खत्म हो जाता।

 

आपके अनुसार ऋण वापसी में किसानों को और क्या सहूलियत दी जानी चाहिए?

कभी कभार जैसे गेंहू और चावल में सरकार का समर्थन मूल्य है, लेकिन सरसों, प्याज, कपास और सब्जी वगैरह में दाम गिर जाते हैं। ऐसे में किसान को बैंक का ऋण चुकाने के लिए अपनी फसल सस्ते दामों में बेचने पर मजबूर होना पड़ता है। तो उसको यह सुविधा भी दी जानी चाहिए वह छह महीने के बाद भी कर्ज वापस लौटा सके। अगर उस समय उचित दाम नहीं मिल रहा है तो तीन महीने किसी कोल्ड स्टोरेज में रख कर उसके बाद भुगतान कर दे। इस प्रकार कृषि को हमें सामूहिक रूप से देखना है न कि केवल कृषि से देखना है। उसी तरह किसान ने फसल तो पैदा कर ली लेकिन उसके भण्डारण की उचित जगह नहीं होने पर यदि इसके लिए ग्रामीण क्षेत्रों में कोई व्यक्ति या किसान खुद गोदाम बना रहा है, उसको भी कृषि मानना चाहिए।

 

पशुपालन और डेयरी क्षेत्र के लिए आप क्या कर रहे हैं?

हमने कई जगह पर भैसों, गायों के लिए ऋण दिया। लेकिन वहां पर कोई एयरकंडीशन, चिलिंग प्लांट या रेफ्रीजरेटर न होने के कारण दूध खराब हो जाता है। 2-3 घंटे के अन्दर अगर उस दूध को न उठाया जाए तो किसानों को इससे हानि होती है। गुजरात में संग्रह करने की सुविधा बहुत अच्छी है। भारत के अधिकतर क्षेत्रों में विशेषकर उत्तरी और पूर्वी भारत के अधिकतर गांवों में दूध निकालने के दो घंटे के बाद उसे संरक्षित न करें तो वह खराब हो जाएगा। अगर वहां छोटे-छोटे रेफ्रिजरेटर लगा दिए जाएं तो यह समस्या दूर हो सकती है। जिनके पास फ्रिज नहीं है वैसे किसानों को हम कहते हैं कि आप फ्रिज ले लें। यही कारण है कि भारत का 30 से 40 प्रतिशत दुग्ध बेकार चला जाता है। अगर किसानों को यह विश्वास नहीं होगा कि मेरा दूध समय पर बिक जाएगा तो वह जानवरों की ठीक ढंग से देखभाल नहीं करता है। उसमें पैसा नहीं लगाता। भारत में आज भी 20 से 30 प्रतिशत गांवों में बिजली नहीं है। अगर किसी ने जेनरेटर वगैरह से चला लिया तो वह बहुत मंहगा है। जैसे सूरज ढलने के बाद गांव में लोग काम नहीं करते हैं। तो अगर वहां सोलर पैनल लगाया जाए, सोलर लैंप लगाया जाए तो कार्य साढ़े छह सात बजे खत्म होने के बजाए दस बजे रात में खत्म होगा, अगर हम किसी को सोलर पैनल के लिए ऋण दे रहे हैं तो वह कृषि में गिना जाए। भारत के शहरों में पन्द्रह साल पहले गृह ऋण की व्यवस्था थी। जब से गृह ऋण की व्यवस्था हुई तब से बहुत सारे लोगों ने घर बनाये, बहुत से लोगों ने वाहन खरीद लिए। इसी तरह अगर सोलर पैनल की फाइनांसिंग भी हम कृषि में माने तो देश का प्रभावी समय बढ़ सकता है। शाम में छह बजे के बाद न तो बच्चे पढ़ते हैं और न ही कोई काम हो पाता है।

 

आप कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी के तहत क्या कर रहे हैं?

सीएसआर में हमारी बारह हजार शाखाएं हैं। मैंने हर शाखा को कहा है कि अपने निकट के स्कूल में जा कर दस पंखे लगाएं। हमने शिक्षक दिवस पर एक ही दिन में एक लाख बीस हजार पंखे लगाए। सीमित साधन में उपयुक्त कार्य करने की जरूरत है। जितने भी पंखे जिस स्कूल में लगे हैं, स्कूल के नाम व पता के साथ मैंने वेबसाईट पर डाल दिया है। इस प्रकार हम ऐसी कार्रवाई और करना चाहते हैं, जैसे स्कूलों में पीने के पानी की व्यवस्था नहीं है, जन सुविधा नहीं है तो ये सब करना हमारे लिए कठिन है। दूसरी बात स्कूलों में जो दीवारें हैं उस पर राष्ट्रीयकृत बैंकों को विज्ञापन के लिए जगह दिया जाए तो महीने में कुछ किराया भी उससे प्राप्त हो जाएगा।

 

आपके अनुसार माइक्रोफाइनांस ग्रामीण क्षेत्र में कितना कारगर है?

इसमें बदनामी होती है। माइक्रोफाइनांस कंपनियों को हम 12 प्रतिशत पर ऋण देते हैं और वो 28-30 प्रतिशत लेते हैं। इससे बदनामी होती है। और फिर यह कहा जाएगा कि बैंक ने साहूकार का विकल्प देने के बजाए दुबारा उसी को फाइनांस कर दिया। तो हमारे यहां यह एक बहुत बड़ी विडंबना है।

 

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