क्या भ्रष्टाचार की गंगोत्री है संघ लोक सेवा आयोग?

UPSCनई दिल्ली, लो.पं. ब्यूरो

भर्ती लोक प्रशासन की रीढ़ होती है। भारत में संघीय स्तर पर आई.ए.एस. अधिकारियों की भर्ती और पदोन्नति के लिए संविधान द्वारा संघ लोक सेवा आयोग तथा राज्य स्तर के लोक सेवकों की भर्ती की जिम्मेदारी राज्य लोक सेवा आयोग को दी गई है। आज सर्वव्यापी भ्रष्टाचार में लोक सेवकों की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। क्या एक बड़े वृक्ष के सभी गुण बीज में मौजूद नहीं होते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि भर्ती में जो गड़बड़ियां हैं वही सेवा काल में विशाल वटवृक्ष बन जाती हैं। जिसके नीचे देश की जनता का विकास अवरूध्द हो रहा है। ट्रिकल डाऊन थ्योरी के विकास का संसाधन रूपी जल क्या रोशनी रूप में भी नीचे नहीं आ पा रहा है। लोक पंचायत को अपनी तहकीकात में भर्ती के स्तर पर व्यापक गड़बड़ियों का पता चला। कुछ गड़बड़ी तो स्पष्ट भ्रष्टाचार के साधारण लेन देन पर आधारित थी। जिसमें पंजाब, महाराष्ट्र, हरियाणा तथा झारखण्ड के राज्य लोक सेवा आयोग शामिल थे। परन्तु उत्तार प्रदेश, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों में भ्रष्टाचार का ज्यादा पैनापन करते हुए स्केलिंग एवं मोडेरेशन के सहारे गड़बड़ी की गयी।

संघ लोक सेवा आयोग जिस पर सबसे प्रतिष्ठित आई.ए.एस. की परीक्षा लेने का दायित्व है, इसके द्वारा स्केलिंग एवं मोडेरेशन का सबसे नंगा खेल शुरू किया गया। इसके अन्तर्गत यह कह कर नम्बर बढ़ाया गया कि विभिन्न वैकल्पिक विषयों में समानता लाने के लिए ऐसा किया गया। परन्तु उसका कोई प्रमाण नहीं मिला।

देश में सभी राज्य लोक सेवा आयोग में स्केलिंग की प्रक्रिया यू.पी.एस.सी. की सलाह से होती है। छत्तीसगढ़ में नाम के आधार पर स्केलिंग होती है तो उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग ने स्केलिंग में पूर्णांक से भी ज्यादा नम्बर दिया। पंजाब में पिछले कई सालों से राज्य लोक सेवा की परीक्षा ही नहीं हुई तो हरियाणा राज्य लोक सेवा आयोग के सभी पूर्ववर्ती सदस्य एवं अधयक्ष बदलने के बाद ही परीक्षा आयोजित हुई। इसका मूल कारण या तो पूर्ववर्ती सरकार का गलत लोगों का मनोनयन या वर्तमान सरकार की अपनी मनमानी चलाने की मंसा है।

संघ लोक सेवा आयोग की पड़ताल में ऐसे कई मामलों का पता चला जिसमें लोगों ने व्यक्तिगत स्तर पर या सामूहिक स्तर गड़बड़ी के विरूध्द केस लड़ा और जीत हासिल की। इसी क्रम में 2006 से संघ लोक सेवा आयोग के गोपनीयता और असहयोगात्मक रवैया के खिलाफ संगठनात्मक तौर पर लड़ने वाले संगठन ट्रांसपरेन्सी सीकर्स का उदाहरण उल्लेखनीय है जिससें अनेक जानकारियां मिलीं।

1985 में पटना और भोपाल के केन्द्र से एक भी अभ्यर्थी प्री की परीक्षा पास नहीं कर सका। जब इन लोगों ने विरोधा प्रदर्शन किया और मीडिया ने इसे उजागर किया तब हकीकत सामने आई। संघ लोक सेवा आयोग की उस परीक्षा की जांच में प्रयुक्त कम्प्यूटर की एक टेप सही नहीं थी, जिसकी वजह से 2058 अभ्यर्थी प्रभावित हुए और बाद में उनमें से 232 उम्मीदवारों का चयन किया गया।

अमानवीय व असंवेदनशील व्यवहार है आयोग का – पीड़ित छात्र

वर्ष 2007 में संघ लोक सेवा आयोग द्वारा अंतिम परिणाम की घोषणा के बाद 96 छात्रों (जिनमें 76 अन्य पिछडे वर्ग, 19 अनुसूचित जाति एवं 1 अनुसूचित जनजाति) का नाम मेरिट लिस्ट से हटा दिया गया। पीड़ित छात्रों का कहना है कि आई.ए.एस. जैसी परीक्षा में चयन होने के बाद बाहर होना कितना त्रासदीपूर्ण है इसका अन्दाजा नहीं लगाया जा सकता। कई छात्रों के माता-पिता, रिश्तेदार इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर पाए। कुछ बीमार हो गये और उनका इलाज भी करना पड़ा। छात्रों का कहना है कि कारण चाहे जो हो अगर दो महीने बाद बाहर ही करना था तो उनका चयन क्यों किया गया। हमें तकनीकी कारणों से मतलब नहीं है, परिणाम बाद में भी घोषित कर सकते थे।

1985 में ही भोपाल केन्द्र से संघ लोक सेवा आयोग की मुख्य परीक्षा में एक भी लड़के उत्ताीर्ण नहीं हो पाये। बाद में पता चला कि सामान्य अधययन द्वितीय पत्र की सारी उत्तार-पुस्तिकायें गायब थीं। आयोग ने पुन: अभ्यर्थियों की उक्त प्रश्न पत्र की परीक्षा ली और उनमें से 25 अभ्यर्थी सक्षात्कार के लिए चयनित हुए। अंतिम रूप से 22 उम्मीदवार चयनित हुए।

1985 में ही सी.बी.आई. ने आई.पी.सी. की धारा 420, 464, 471 और 120-बी के तहत संघ लोक सेवा आयोग में अनुभाग अधिकारी के रूप में कार्यरत रतिपाल सरोज को उत्तार-पुस्तिका बदलने के आरोप में पकड़ा। सरोज ने स्वयं किसी प्रतिभावान अभ्यर्थी की उत्तार-पुस्तिका अपने लिए बदलकर वह रैंक हासिल कर लिया था। अन्य अधिकारियों जैसे संजय भाटिया ने गलत जाति-प्रमाण पत्र प्रस्तुत कर अपने लिए आई.पी.एस. का पद सुरक्षित कर लिया।

2001 में नितिन वर्मा को शुरू में 278वां रैंक मिला, लेकिन उत्तार-पुस्तिका के पुर्नमूल्यांकन के बाद उन्हें 28वां रैंक मिला। 1997 में महेश वर्गकाल को चयन करने के बावजूद उन्हें बाद में चयन सूची से बाहर कर दिया गया, लम्बी न्यायिक लड़ाई के बाद जीत हासिल हुई।

संघ लोक सेवा आयोग की भर्ती में गड़बड़ी और अनियमितता के खिलाफ पहली बार 2006 में संगठनात्मक स्तर पर लड़ाई शुरू की गई। ट्रांसपेरेंसी सीकर्स ने पहली बार पूरी प्रणाली पर पारदर्शिता के लिए लड़ाई शुरू की। इसमें प्रसिध्द अधिवक्ता प्रशांत भूषण, अमन लेखी, समाज सेवी अरविंद केजरीवाल और संदीप पाण्डे ने भी साथ दिया।

संघ लोक सेवा आयोग की केन्द्रीय सूचना आयोग, दिल्ली उच्च न्यायालय की एकल पीठ और डबल पीठ में हार हुई और फैसला हमेशा पारदर्शिता एवं विद्यार्थियों के पक्ष में रहा। अब मामला सर्वोच्च न्यायालय में अंतिम फैसले के लिए विचाराधाीन है। संघ लोक सेवा आयोग की दलील है कि अगर वह अपनी प्रणाली में पारदर्शिता लायेगी तो पूरा सिस्टम कमजोर हो जायेगा और केस की बाढ़ आ जायेगी। यह बात जाहिर है कि आयोग उत्तार पुस्तिका के मूल अंक को न दिखाकर स्केल्ड/मोडरेटेड अंक दिखाता है जब कि राजस्थान, उत्तार प्रदेश आदि के लोक सेवा आयोग मूल अंक एवं स्केल्ड/मोडरेटेड अंक भी दिखाते हैं। 2006 के बाद लगभग हर साल प्रत्येक परीक्षा परिणाम पर न्यायालय में कोई न कोई केस हो रहा है तथा ट्रांस्परेंसी सीकर्स अभ्यर्थियों को अपना सहयोग दे रही है। 2005, 2006, 2007 और 2008 के मुख्य परीक्षा परिणाम को लेकर अभ्यर्थियों में काफी रोष है।

एक अभ्यर्थी चितरंजन कुमार ने संघ लोक सेवा आयोग पर उत्तार पुस्तिका बदले जाने का आरोप लगाया है। उनके हिन्दी द्वितीय पत्र में काफी अच्छे प्रयत्न और प्रदर्शन के बावजूद उन्हें सिर्फ 90/300 अंक मिले। मामले की छानबीन करने पर आयोग ने पहले दो उत्तार पुस्तिका और बाद में तीन उत्तार पुस्तिका की बात स्वीकारी। जबकि छात्र ने कुल 4 उत्तार पुस्तिका लेने की बात कही है। उन्होंने आयोग से उस उपस्थिति पत्रक की फोटोकॉपी मांगी जिस पर उत्तार पुस्तिका का सीरियल नम्बर लिखा होता है।

आर.टी.आई. के तहत 24 जुलाई 2009 के जवाब में आयोग ने उसे नष्ट करने की बात कही। परन्तु एक अन्य आर.टी.आई. के जवाब में उसे 24 सितम्बर 2009 तक नष्ट नहीं होने की बात स्वीकारी है और इसकी रिटेशन अवधि 2011 तक होने की बात कही है।

सूचना के अधिकार कानून को संघ लोक सेवा आयोग विशेष महत्व नहीं दे रहा है। अगर संघ लोक सेवा आयोग द्वारा भर्ती में की जा रही इस अनियमितता को नहीं रोका गया तो हमारी पूरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया धाराशायी हो सकती है।

1 comment to क्या भ्रष्टाचार की गंगोत्री है संघ लोक सेवा आयोग?

  • YES IT IS RIGHT, I FEEL THIS. I FEEL INJUSTICE EVERY WHERE. OUR GOVERNMENT CAN NOT CHOOSE A BEST LOK SEVAK,IN THIS SOCIAL SYSTEM. PLEASE WORK HARD AND MAKE A BEST SYSTEM WITH OUT MONEY. IF WE TRY TO MAKE BEST FUTURE THAN WE MUST WORK HARD TO REFORM OUR INDIA WITH OUT MONEY, BIG PAY ARE MAKING INJUSTICE, FOOD AND CLOTHES ARE MUST FOR EVERY ONE. OUR SCHOOLS BUILDING ARE FREE FOR EIGHTEEN [18] HOUR FREE WITH OUT WORKING IT IS INJUSTICE. WITH OUT MONEY WE CAN GROWTH MORE AND MORE, MONEY MINDED ARE NOT WORKING BEST FOR FUTURE OF OUR INDIA.
    I FEEL WE CAN MAKE ALL THINGS WITH MONEY. MONEY IS MAKING MORE CORRUPTION IN OUR SOCIETY. TRUTH WORK CAN MAKE OUR FUTURE AND REFORM OUR COUNTRY…GOOD lUCK1 ALL THE BEST. O K.

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