परीक्षा प्रणाली के लोकतंत्रीकरण की आवश्यकता : ट्रांसपेरेंसी सीकर्स - अमित कुमार

Amit Kumar Transperency rseekerभ्रष्टाचार भारतीय जीवन यापन प्रणाली का अंग बन चुका है। साठ वर्षों में भ्रष्टाचार एवं सूचना के अधिकार के बीच सह-सम्बध्दता भारतीय परीक्षा व्यवस्था में देखने को मिली है।

भारत की पूरी परीक्षा व्यवस्था लोकतंत्र के अभाव का शिकार रही है। सैध्दांतिक रूप से तो हम लोकतांत्रिक देश के निवासी हैं, लेकिन पिछले साठ वर्षों के दौरान छात्रों की योग्यता परीक्षण के संदर्भ में लोकतान्त्रिक मूल्यों की अपेक्षा देवत्व भावना को महत्व दिया जाता है। जबकि चीन में छात्रों की परीक्षा प्रणाली एवं शिक्षा प्रणाली पूरी तरह लोकतान्त्रिक है। छात्रों को अपनी कमी की जानकारी एवं सुधारने का मौका मिलता है। माधयमिक स्तर से लेकर उच्च शिक्षा स्तर तक नौकरशाही के एक वर्ग ने परीक्षा व्यवस्था में विद्यमान अनियमितता का लाभ उठाकर उसे पैसा बनाने का एक व्यवसाय बना लिया। अर्थशास्त्र के मांग एवं पूर्ति नियम यहां भी लागू होता है। जैसा कि निम्न मधयम वर्ग और निन्न वर्ग में आज भी सरकारी नौकरी के प्रति ललक है। फलत: सरकारी नौकरी की मांग पूर्ति से अधिक है। इसी असंगतता ने इस क्षेत्र में संगठित भ्रष्टाचार को जन्म दिया।

भारत के संविधान में लोक सेवकों की नियुक्ति हेतु राज्य लोक सेवा आयोग एवं संघ लोक सेवा आयोग की व्यवस्था की गयी थी। इन्हें परीक्षा व्यवस्था के निमंत्रण एवं नियमन में राजनीतिक एवं प्रशासनिक हस्तक्षेप से बचाने हेतु स्वायत्तता प्रदान की गयी थी। लेकिन पिछले साठ वर्षों के दौरान इनके कार्यकरण से यह आभास होता है कि इन्होंने इसका दुरूपयोग किया है। सूचना के अधिकार के बाद अनेक राज्य लोक सेवा आयोग की परीक्षा प्रणाली खुल चुकी है और एक भी ऐसा लोक सेवा आयोग नहीं है जो बेदाग बचा हो। लेकिन अभी तक भारत में ही नहीं बल्कि अनेक विकासशील देशों में भी परीक्षा के संचालन में मानक मानी जाने वाली संस्था संघ लोक सेवा आयोग में व्याप्त अनियमितता और भ्रष्टाचार का सामूहिक रूप से पर्दाफाश नहीं हुआ है। प्रारम्भ में तो संघ लोक सेवा आयोग अपनी परीक्षा प्रणाली को सूचना के अधिकार से बाहर ही रखना चाहता था। लेकिन अभी भी आयोग परीक्षा से जुड़ी जानकारियां नहीं देना चाहता। आयोग ने उच्चतम न्यायालय में दिए गए हलफनामा में माना है कि अगर छात्रों द्वारा मांगी गयी जानकारी प्रदान कर दी गई तो पूरी परीक्षा प्रणाली अपने आप नष्ट हो जाएगी। यहां तक कि इसने यह भी स्वीकार किया है कि चयन में सिर्फ योग्यता का धयान नहीं रखा जाता है।

इस समय नौकरशाही में संरचनात्मक परिवर्तन की आवश्यकता है और इसका प्रारम्भ नियुक्ति प्रक्रिया से होना चाहिए। संघ और राज्य लोक सेवा आयोग के प्रशासनिक सेवाओं के चयन प्रक्रिया में प्रारम्भिकी परीक्षा कोठारी आयोग की संस्तुति पर आधारित थी। इस प्रणाली के तहत एक अनिवार्य विषय एवं सामान्य अधययन था। विभिन्न विषयों के बीच स्केलिंग लागू की गई थी और एक ही विषय में विभिन्न छात्रों के बीच समानता लाने हेतु अन्त: विषय स्केलिंग प्रणाली का प्रयोग किया गया। इसका उपयोग प्रारम्भिक एवं मुख्य परीक्षा दोनों में किया गया। प्रारम्भिक परीक्षा का उद्देश्य छात्रों को छांटना है। इस स्तर पर इतनी जटिल प्रणाली अनावश्यक थी। कुछ राज्य में इस स्तर पर सिर्फ सामान्य अधययन की परीक्षा है जैसे बिहार, तमिलनाडु।

भारतीय नौकरशाही सरलता की अपेक्षा जटिलता में अधिक विश्वास करती है क्योंकि इसमें व्याप्त जटिलता ही तो उनकी शान है।

इसमें सुधार हेतु अनेक आयोगों का गठन किया गया। लेकिन इसमें लोकतांत्रिक परिवर्तन नहीं किया गया। पिछले वर्षों महत्वपूर्ण ‘होता आयोग’ एवं वाई.के. अलघ आयोग की रिपोर्ट आयी। प्रशासनिक सुधार आयोग के अधयक्ष श्री मोइली का कहना था कि हम सिविल सेवा के संरचनात्मक विनाश के लिए तैयार हैं और इसका प्रारम्भ सिविल सेवा परीक्षा से होगा। लेकिन इसमें विद्यमान स्केलींग प्रणाली और नियुक्ति के बाद प्रतियोगिता का अभाव है। केन्द्रीय सूचना आयोग के मुख्य वजाहत हबीबुल्लाह का मानना है कि छात्रों को एक समान प्लेयिंग फील्ड मिलना चाहिए, जो कि वर्तमान व्यवस्था में नहीं है। अलघ आयोग ने प्रारम्भिक एवं मुख्य परीक्षा का चयन सामान्य अधययन के आधार पर करने की अनुशंसा की थी जिसमें स्केलिंग की कोई आवश्यकता नहीं थी। लेकिन सरकार भी इस पर विचार करने के लिए तैयार नही है क्योंकि सरकार भी नौकरशाही के बाहर की आवाज सुनना नहीं चाहती है।

प्रतियोगिता विकास को बढ़ावा देती है। लेकिन हमारे यहां पूरी नीति निर्माण की प्रक्रिया नौकरशाही के लिए आरक्षित है। इसके कारण एक समान विचारधारा वाले लोगों के बीच मांग अधिक है। अगर एक स्तर के बाद नौकरशाह के समूह में नीति निर्माण की प्रक्रिया में बाहर के विशेषज्ञ भी शामिल होना चाहते हैं तो इसमें खराबी क्या है। जैसा कि कौटिल्य ने कहा था कि स्थायी नौकरशाही भ्रष्टाचार की जननी है लेकिन हमने पिछले साठ वर्षों में कौटिल्य को नहीं सुना और औपनिवेशिक तंत्र को बनाए रखा है। मोइली इस संदर्भ में सार्थक प्रयास कर रहे हैं लेकिन उन्हें सिर्फ नौकरशाही की आवाज नहीं बल्कि सामान्य नागरिक की आवाज भी सुनना चाहिए।

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