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1 comment to लोक पंचायत – जुलाई 2011

  • Dheerendra Kumar Yadav

    काले धन का अर्थशास्त्र

    काले धन का जवाब है वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी)। भाजपा शासित प्रदेश जीएसटी का रास्ता रोक कर काले धन पर अंकुश न लगाने के सबसे बड़े दोषी हैं। इस तरह वे काले धन की महामारी को फैलने में सहयोग प्रदान कर रहे है। देश भर में बाबा रामदेव के प्रति जबरदस्त श्रद्धा है। उन्होंने योग के प्रति जागरूकता पैदा कर करोड़ों लोगों को स्वस्थ जीवन की ओर प्रेरित किया, किंतु एक क्षेत्र विशेष में ठोस उपलब्धियों का यह मतलब नहीं कि वह काले धन के विशेषज्ञ हो गए है। उनकी मंशा तो अच्छी है, किंतु वह काले धन के अर्थशास्त्र को नहीं समझते। न तो रामदेव और न ही भाजपा यह समझती है कि भारतीयों द्वारा विदेशी बैंकों में जमा किए गए काले धन से कहीं बड़ी मात्रा में काला धन भारत में मौजूद है। इसलिए देश की पहली प्राथमिकता देश के अंदर काले धन पर रोक लगाने की होनी चाहिए और इसका सर्वश्रेष्ठ उपाय है जीएसटी लागू करना। जीएसटी व्यापारियों और नागरिकों के नकद व्यवहार पर रोक लगाता है, क्योंकि इसमें कर के भुगतान पर प्रोत्साहन है।

    यह ठीक है कि सरकार को विदेश में जमा अवैध धन भारत लाने का प्रयास करना चाहिए, किंतु तमाम देशों का अनुभव यह बताता है कि यह बहुत धीमी, जटिल और बोझिल प्रक्रिया है। सरकार को विदेशी बैंकों में जमा काला धन लाने का प्रयास करते रहना चाहिए, किंतु बाबा रामदेव को यह भी समझना चाहिए कि अगर देश काले धन से निपटने का प्रयास नहीं करता तो भारत में इससे भी बड़ी मात्रा में फिर से काला धन जमा हो जाएगा।

    काला धन क्या है? जब भी कोई व्यक्ति कर से बचने के लिए बिना बिल के नकद सामान खरीदता है तो काले धन का सृजन होता है। इसलिए काला धन मूलत: कर चोरी से पनपता है। जब कोई डॉक्टर या वकील बिना रसीद दिए नकद पैसे लेकर कर बचाता हैं तो वह काला धन उत्पन्न करता है। जब एक नागरिक टूथपेस्ट खरीदता है और दस प्रतिशत कर बचाने के लिए दुकानदार से बिल नहीं लेता तो दुकानदार के साथ वह भी करअपवंचना और काले धन की उत्पत्ति का दोषी होता है।

    वस्तु एवं सेवा कर कानून से बिना बिल सामान की खरीदफरोख्त पर अंकुश लगेगा, क्योंकि मूल्यवर्धित कर होने के कारण दुकानदार निर्माण और वितरण के पहले के चरण में भुगतान किए गए कर में स्वयं भुगतान किए गए कर को समायोजित नहीं करा पाएगा। वह टूथपेस्ट पर पहले से अदा कर दिए गए कर की वापसी का दावा नहीं कर पाएगा। जहां तक अप्रत्यक्ष कर का सवाल है, जीएसटी भारतीय व्यापारियों और नागरिकों को अधिक ईमानदार और कानून के पालन की ओर प्रेरित करेगा।

    जीएसटी के और भी महत्वपूर्ण लाभ है। भारत में किसी भी सामान की बिक्री पर राज्य बिक्री कर, केंद्रीय बिक्री कर, प्रवेश कर, सेवा कर, उत्पाद कर, चुंगी आदि कर प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। इसी कारण भारत पूरी दुनिया में संभवत: सबसे अधिक दर से अप्रत्यक्ष कर वसूलने वाला राष्ट्र है। साथ ही सबसे भ्रष्ट देश भी है, क्योंकि प्रत्येक कर संग्रहक घूस की उम्मीद करता है। चुंगी सबसे खराब कर पद्धति है, जिसे विकसित देशों ने सौ साल पहले ही अलविदा कह दिया था। जीएसटी इन तमाम अप्रत्यक्ष करों को एकीकृत करके एकल, पारदर्शी और सरल प्रणाली यानी एकल बाजार की व्यवस्था में बदल देगा। इसके तहत प्रत्येक चरण पर वर्धित मूल्य पर ही कर का भुगतान करना होगा और इस प्रकार करदाताओं पर कर का बोझ कम हो जाएगा। कुछ मामलों में इसके कारण कीमतें दस फीसदी तक कम हो जाएंगी, क्योंकि यह बिना बिल के नकद व्यवहार को हतोत्साहित करता है, इसलिए करदाता सरकार की आय बढ़ा देंगे। अप्रत्यक्ष करों के संजाल के खात्मे के साथ ही कारोबारी लागत और भ्रष्टाचार में भी गिरावट आएगी। कोई भी यह सवाल उठा सकता है कि अगर यह इतना अच्छा विचार है तो इसे साल दर साल टाला क्यों जा रहा है? केंद्र इसे लागू करने का उत्सुक है। वित्त मंत्री ने इसे भारत के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण कर सुधार बताया है। समस्या यह है कि जीएसटी व्यवस्था में केंद्र व राज्यों के बीच कर का बंटवारा होगा। राज्य की खुद कर वसूलने की अधिसत्ता खत्म हो जाएगी। बहुत से राज्यों को संदेह है कि केंद्र उन्हे पर्याप्त धन नहीं देगा, किंतु केंद्र ने बड़ी उदारता के साथ राज्यों को बेहतरीन राजनीतिक सौदे की पेशकश की है। इसने वचन दिया है कि कर के रूप में जितनी राशि वे वसूल कर रहे है, उससे अधिक राशि केंद्र द्वारा दी जाएगी। इस कारण बहुत से राज्य जीएसटी पर राजी हो गए है, किंतु अनेक राज्य इस पर सहमत नहीं है। इनमें से अधिकांश राज्य भाजपा शासित है। जाहिर है, इसमें राजनीति आड़े आ रही है। यह जानना दिलचस्प है कि भाजपानीत राजग सरकार ने ही सबसे पहले जीएसटी का प्रस्ताव रखा था। तब राजग सरकार को यह विचार इतना भाया था कि उसने इसके क्रियान्वयन को स्वीकार कर लिया था। संप्रग-1 में वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने राज्यों को इसके लिए राजी करने का प्रयास किया। संप्रग-2 में प्रणब मुखर्जी राज्यों को जीएसटी के लिए तैयार करने का पुरजोर प्रयास कर रहे है, किंतु भाजपा शासित राज्य इसके विरोध पर अड़े हुए है। ऐसे में जीएसटी के विरोध से देश में काले धन को पोषित करने वाली भाजपा किस मुंह के साथ केंद्र सरकार को विदेश से काला धन वापस न लाने के लिए कठघरे में खड़ा कर पाएगी?

    बड़ी बाधा यह है कि जीएसटी कानून तैयार करने के लिए संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता है। संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत के साथ पारित होने के बाद 50 फीसदी राज्यों को विधानसभाओं में इसका अनुमोदन करना होगा। संप्रग के पास इतना संख्याबल नहीं है, जिस कारण इसे भाजपा के सहयोग की आवश्यकता है। पिछले आम चुनाव में अपने घोषणापत्र में भाजपा ने जीएसटी के लिए वचनबद्धता को रेखांकित किया था। हालांकि चुनाव में हार के बाद यह जीएसटी को भूल गई। केंद्र सरकार राज्यों को जीएसटी के लिए तैयार करने को पहले ही इसके तीन संशोधित प्रारूप पेश कर चुकी है। मंत्रिमंडल ने अब चौथा प्रारूप भी तैयार कर लिया है। किसी विश्वसनीय अर्थशास्त्री को बाबा रामदेव को बताना चाहिए कि जीएसटी कानून विदेशी खातों में जमा काले धन को भारत लाने से भी अधिक महत्वपूर्ण है। भाजपा पर बाबा के प्रभाव को देखते हुए उन्हे प्रदेश स्तरीय भाजपा नेताओं को भी इसके लिए राजी करने का प्रयास करना चाहिए। अगर बाबा रामदेव भ्रष्टाचार और काले धन को लेकर वास्तव में गंभीर है तो उन्हे जीएसटी के समर्थन में संघर्ष करना चाहिए

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